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परिसीमन 2029 के बाद: 2028 का चुनाव पुराने ढांचे पर, प्रेमनगर में फिर वही समीकरण और दावेदारी होगी तेज

नई दिल्ली/सूरजपुर। लोकसभा में परिसीमन को लेकर हुई चर्चा के दौरान केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah के बयान के बाद अब यह पूरी तरह साफ हो गया है कि अगला परिसीमन 2029 के बाद ही लागू किया जाएगा। इसका सीधा असर छत्तीसगढ़ पर पड़ेगा, जहां 2028 में विधानसभा चुनाव होना है। यानी राज्य में अगला चुनाव मौजूदा परिसीमन के आधार पर ही कराया जाएगा और विधानसभा क्षेत्रों की सीमाओं में कोई बदलाव नहीं होगा। सरगुजा संभाग के प्रेमनगर विधानसभा क्षेत्र में भी यही स्थिति लागू रहेगी और चुनाव पुराने ढांचे पर ही लड़ा जाएगा।
प्रेमनगर विधानसभा क्षेत्र की संरचना पहले की तरह बनी रहेगी, जिसमें विश्रामपुर, सूरजपुर, रामानुजनगर और प्रेमनगर जैसे इलाके शामिल हैं। इन सभी क्षेत्रों का चुनावी परिणाम पर प्रभाव रहता है, लेकिन स्थानीय स्तर पर यह साफ माना जाता है कि रामानुजनगर और प्रेमनगर का रुख सबसे ज्यादा निर्णायक होता है। इन दोनों इलाकों में जिस भी पार्टी को बढ़त मिलती है, पूरे विधानसभा का परिणाम अक्सर उसी के पक्ष में जाता है। यही कारण है कि कोई भी राजनीतिक दल रामानुजनगर और प्रेमनगर को नजरअंदाज नहीं कर सकता और चुनावी रणनीति का केंद्र इन्हीं क्षेत्रों को बनाया जाता है।
परिसीमन नहीं होने का एक और बड़ा असर इस सीट की सामाजिक-राजनीतिक तस्वीर पर पड़ेगा। प्रेमनगर विधानसभा एक अनारक्षित सीट है, जहां सामान्य वर्ग, पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) और अन्य वर्गों के नेता हमेशा से दावेदारी करते रहे हैं। पिछले कुछ समय से यह चर्चा जोर पकड़ रही थी कि 2028 के पहले परिसीमन होगा और प्रेमनगर-रामानुजनगर क्षेत्र को आदिवासी वर्ग के लिए आरक्षित किया जा सकता है। इसी वजह से कई सामान्य और ओबीसी वर्ग के संभावित दावेदार धीरे-धीरे निष्क्रिय होते नजर आ रहे थे और उन्हें लग रहा था कि अब उनके लिए यहां अवसर सीमित हो जाएंगे।
लेकिन गृह मंत्री के स्पष्ट बयान के बाद अब यह स्थिति पूरी तरह बदल गई है। गृह मंत्री अमित शाह ने सदन मैं कहा कि अभी 2029 तक जितने भी चुनाव होंगे सब पुराने व्यवस्था के आधार पर ही होंगे, छत्तीसगढ़ में विधानसभा का चुनाव 2028 में होना है, गृह मंत्री के अनुसार 2028 का चुनाव पुराने ढांचे पर ही होना है, इसलिए प्रेमनगर सीट के अनारक्षित रहने की स्थिति बरकरार रहेगी। ऐसे में एक बार फिर सामान्य वर्ग और ओबीसी समाज के नेता इस क्षेत्र में अपनी दावेदारी मजबूत करने की कोशिश करते नजर आ सकते हैं। राजनीतिक हलकों में यह चर्चा भी तेज हो गई है कि जो नेता अब तक पीछे हटे हुए थे, वे फिर से सक्रिय हो सकते हैं और टिकट की मांग को लेकर सामने आ सकते हैं।
चूंकि चुनाव में अभी काफी समय बाकी है, इसलिए इसे एक लंबी राजनीतिक तैयारी के दौर के रूप में देखा जा रहा है। नेताओं के पास अपने-अपने क्षेत्रों में काम करने, जनता के बीच पकड़ मजबूत करने और अपनी छवि बनाने का पर्याप्त समय है। खासकर रामानुजनगर और प्रेमनगर जैसे प्रभावी इलाकों में लगातार सक्रिय रहना जरूरी होगा, क्योंकि इन क्षेत्रों का रुख ही चुनावी नतीजों की दिशा तय करता है। ऐसे में आने वाले समय में हर राजनीतिक दल के नेता इन क्षेत्रों में अपनी मौजूदगी और प्रभाव बढ़ाने के लिए मेहनत करते नजर आ सकते हैं।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि परिसीमन टलने से जहां एक ओर स्थिरता बनी रहती है, वहीं यह प्रतिस्पर्धा को भी और दिलचस्प बना देता है। अब चुनाव पुराने मुद्दों और पुराने समीकरणों पर ही लड़ा जाएगा, जिसमें सड़क, पानी, स्वास्थ्य, रोजगार और क्षेत्रीय विकास विधायक की सक्रियता,जैसे विषय एक बार फिर केंद्र में रहेंगे। साथ ही, उम्मीदवार की व्यक्तिगत पकड़ और जनसंपर्क भी जीत-हार में अहम भूमिका निभाएंगे।
कुल मिलाकर, परिसीमन 2029 के बाद लागू होने की स्थिति ने प्रेमनगर विधानसभा की राजनीति को एक बार फिर पुराने ट्रैक पर ला दिया है। वही क्षेत्र, वही मतदाता और वही समीकरण एक बार फिर निर्णायक होंगे। लेकिन इस बार खास बात यह रहेगी कि अनारक्षित सीट होने के कारण सामान्य और ओबीसी वर्ग के नेताओं की दावेदारी भी फिर से मजबूत होती नजर आ सकती है, जिससे चुनावी मुकाबला और भी रोचक होने की संभावना है। आने वाले समय में भले ही चुनाव दूर हो, लेकिन जमीन पर सक्रियता और राजनीतिक हलचल धीरे-धीरे बढ़ना तय माना जा रहा है।

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