2993 बोरा धान शॉर्टेज मामला: रामानुजनगर तहसीलदार की भूमिका पर गंभीर सवाल, क्या कार्रवाई नहीं बनती?

रायपुर:- सूरजपुर जिले में धान खरीदी व्यवस्था को लेकर सामने आया छिंदिया सहकारी समिति का मामला अब केवल धान की कमी तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि इस पूरे प्रकरण में रामानुजनगर तहसीलदार की भूमिका और जिला स्तरीय जांच की विश्वसनीयता पर भी गंभीर प्रश्न खड़े हो गए हैं।
प्राप्त तथ्यों के अनुसार 1 जनवरी को रामानुजनगर तहसीलदार ने खाद्य निरीक्षक के साथ छिंदिया धान खरीदी केंद्र में भौतिक सत्यापन किया था। इस दौरान समिति में 2993 बोरा धान की कमी पाई गई, जिसकी अनुमानित कीमत समाचार पत्रों में प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार करीब 40 लाख रुपये बताई गई। यह कोई मौखिक टिप्पणी नहीं थी, बल्कि तहसीलदार ने स्वयं सहकारी समिति के रजिस्टर में लिखित रूप से धान की कमी होने की पुष्टि की थी।
सबसे गंभीर सवाल यह है कि इतनी बड़ी मात्रा में शॉर्टेज पाए जाने के बावजूद तहसीलदार द्वारा तत्काल कोई वैधानिक या दंडात्मक कार्रवाई क्यों नहीं की गई। न स्टॉक सील किया गया, न समिति प्रबंधन के खिलाफ त्वरित नोटिस या प्राथमिकी की जानकारी सामने आई। प्रशासनिक नियमों के अनुसार यह स्थिति अपने आप में कर्तव्य में गंभीर लापरवाही की श्रेणी में आती है।
मामले ने तब और गंभीर रूप ले लिया जब 4 जनवरी को जिला खाद्य अधिकारी के साथ एक टीम पुनः उसी सहकारी समिति में पहुंची। बताया जाता है कि इस टीम ने महज कुछ ही घंटों की जांच के बाद यह निष्कर्ष निकाल दिया कि सरकारी समिति में एक भी बोरा धान कम नहीं है। सवाल यह है कि इतनी कम समयावधि में, बिना किसी विस्तृत तौल, स्टॉक मूवमेंट रिकॉर्ड और परिवहन दस्तावेजों की सार्वजनिक जानकारी के, यह निष्कर्ष किस आधार पर निकाला गया।
सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि जिस तहसीलदार ने 3 दिन पहले लिखित रूप से 2993 बोरा धान की कमी प्रमाणित की थी, उसी तहसीलदार ने जिला टीम की जांच के दौरान यह भी प्रमाणित कर दिया कि अब धान पूरा है। यह स्थिति गंभीर विरोधाभास को जन्म देती है। प्रश्न यह उठता है कि क्या तहसीलदार की पहली रिपोर्ट गलत थी, या फिर दूसरी रिपोर्ट वास्तविक स्थिति को नहीं दर्शाती।
यदि पहली रिपोर्ट गलत थी, तो फिर शासकीय अभिलेखों में इतनी बड़ी मात्रा की कमी को लिखित रूप से दर्ज करना घोर लापरवाही नहीं तो और क्या है। और यदि पहली रिपोर्ट सही थी, तो फिर मात्र तीन दिनों के भीतर बिना किसी स्पष्ट खरीद, आवक या परिवहन प्रक्रिया के धान का पूरा मिल जाना जानबूझकर दी गई मोहलत और संभावित संरक्षण की ओर इशारा करता है।
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यदि कोई अधिकारी शासकीय संपत्ति में कमी पाए जाने के बाद भी कार्रवाई रोककर परिस्थिति बदलने का अवसर देता है, तो यह प्रशासनिक उदासीनता के साथ-साथ विभागीय दायित्वों के उल्लंघन की श्रेणी में आता है। ऐसे मामलों में संबंधित अधिकारी के विरुद्ध विभागीय जांच और दंडात्मक कार्रवाई का स्पष्ट प्रावधान है।
अब मूल प्रश्न यह नहीं रह गया है कि धान कम था या नहीं, बल्कि यह है कि जिला टीम ने कुछ घंटों में किस प्रक्रिया से शॉर्टेज शून्य घोषित किया, और तहसीलदार ने अपनी ही लिखित रिपोर्ट के विपरीत दूसरा प्रमाण कैसे दे दिया। यदि इन बिंदुओं की निष्पक्ष और स्वतंत्र जांच नहीं की गई, तो यह पूरा मामला प्रशासनिक व्यवस्था की विश्वसनीयता पर गहरा प्रश्नचिह्न लगा देगा।
धान खरीदी जैसे संवेदनशील और सार्वजनिक धन से जुड़े मामले में जवाबदेही तय करना अनिवार्य है। अब निगाहें जिला प्रशासन पर टिकी हैं कि रामानुजनगर तहसीलदार की भूमिका की जांच होती है या यह प्रकरण भी बिना कार्रवाई के समाप्त हो जाएगा।




