दुनिया के मेडिकल विज्ञान को नई चुनौती! 20 दिन के मासूम में 41.4 ग्राम हीमोग्लोबिन, सूरजपुर में आया पहला मामला

सूरजपुर। दुनिया के मेडिकल साइंस के लिए एक नया मामला सूरजपुर जिले में आया है जिसके आने के बाद अब मेडिकल फील्ड में बहुत कुछ बदलाव आ सकता है।यह एक ऐसा मामला है जिसको लेकर बड़े बड़े वैज्ञानिक भी परेशान हो सकते है। क्योंकि इस एक रिपोर्ट ने मेडिकल साइंस को चुनौती दे दिया है।
सरकारी अस्पतालों की लैब का काम मरीज की सही बीमारी पकड़ना होता है, लेकिन इस बार लगता है सूरजपुर जिला अस्पताल की लैब ने बीमारी नहीं, सीधे मेडिकल साइंस को ही चौंकाने का बीड़ा उठा लिया। जिला अस्पताल से जारी CBC रिपोर्ट में महज 20 दिन के एक मासूम बच्चे का हीमोग्लोबिन 41.4 g/dL दर्ज कर दिया गया। रिपोर्ट सामने आते ही लोग हैरान रह गए। कोई बोला, “इतना हीमोग्लोबिन तो शायद लोहे की फैक्ट्री में भी नहीं मिलेगा!” तो किसी ने तंज कस दिया, “स्वास्थ्य विभाग को अब रिसर्च सेंटर घोषित कर देना चाहिए, क्योंकि यहां ऐसी-ऐसी खोज हो रही हैं जो दुनिया के बड़े-बड़े वैज्ञानिक भी नहीं कर पाए।” कुछ लोगों ने तो मजाक में यह तक कह दिया कि अगर यह रिपोर्ट सही है, तो मेडिकल कॉलेजों की किताबें बदलनी पड़ेंगी और अगर गलत है, तो पहले लैब की कार्यप्रणाली बदलनी पड़ेगी। सवाल यह भी उठ रहा है कि आखिर रिपोर्ट मरीज तक पहुंचने से पहले किसी जिम्मेदार व्यक्ति ने उसे देखा भी था या नहीं? या फिर अब सारी जिम्मेदारी मशीन और प्रिंटर के भरोसे छोड़ दी गई है।

व्यंग्य अपनी जगह है, लेकिन मामला बेहद गंभीर है। मरीज अस्पताल इलाज कराने जाता है, किसी वैज्ञानिक प्रयोग का हिस्सा बनने नहीं। अगर एक रिपोर्ट में इतनी बड़ी गड़बड़ी हो सकती है, तो आम आदमी कैसे भरोसा करे कि उसकी बाकी जांच सही होगी? लोग चुटकी ले रहे हैं कि “अगर यही रफ्तार रही तो अगली रिपोर्ट में लिखा मिलेगा कि मरीज के शरीर में चार दिल, सात फेफड़े और बारह लीटर खून मिला है।” स्वास्थ्य विभाग आए दिन बेहतर स्वास्थ्य सेवाओं के बड़े-बड़े दावे करता है, लेकिन ऐसी रिपोर्टें उन दावों की पोल खोलती नजर आती हैं। यह खबर किसी मरीज का मजाक नहीं उड़ाती, बल्कि उस व्यवस्था पर सवाल उठाती है जो एक साधारण लैब रिपोर्ट तक की विश्वसनीयता सुनिश्चित नहीं कर पा रही। अब देखना यह है कि विभाग इस मामले की जांच कर जिम्मेदारी तय करता है या फिर इसे भी एक और “प्रिंटिंग मिस्टेक” बताकर फाइल बंद कर दी जाएगी। आखिर जनता को इलाज चाहिए, कल्पना शक्ति नहीं।




