धान शॉर्टेज से ‘सब ठीक’ तक : तहसीलदार के विरोधाभासी रवैये पर सवाल ?

सूरजपुर :- रामानुजनगर विकासखंड अंतर्गत आदिम जाति सेवा सहकारी समिति छिंदिया में धान खरीदी के दौरान सामने आए शॉर्टेज प्रकरण ने अब प्रशासनिक तंत्र की निष्पक्षता और जवाबदेही पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। यह मामला केवल धान की कमी तक सीमित नहीं रहा, बल्कि तहसीलदार की भूमिका, जांच प्रक्रिया और जिला प्रशासन की निष्क्रियता को लेकर व्यापक चर्चा का विषय बन गया है। उपलब्ध जांच अभिलेखों और तहसीलदार द्वारा दिए गए बयानों के अनुसार, प्रारंभिक स्तर पर की गई जांच में समिति में धान का शॉर्टेज पाया गया था। नियमों के तहत यह स्थिति अत्यंत गंभीर मानी जाती है, क्योंकि समर्थन मूल्य पर खरीदे गए धान की सुरक्षा सीधे शासन की जिम्मेदारी होती है।
प्रावधानों के अनुसार, यदि किसी सहकारी समिति में धान का शॉर्टेज पाया जाता है, तो तत्काल एफआईआर दर्ज करना, स्टॉक को जब्त करना, समिति को सील करना और जिम्मेदार अधिकारियों पर निलंबन की कार्रवाई अनिवार्य होती है। लेकिन इस प्रकरण में शॉर्टेज दर्ज होने के बावजूद न तो कोई त्वरित दंडात्मक कार्रवाई की गई और न ही समिति को आगे के संचालन से रोका गया। इससे यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि जब तहसीलदार की प्रारंभिक जांच में कमी सामने आ चुकी थी, तब नियमों के अनुसार कठोर कदम क्यों नहीं उठाए गए। क्या यह महज प्रशासनिक लापरवाही थी, या फिर किसी को राहत देने के उद्देश्य से कार्रवाई को जानबूझकर टाल दिया गया?मामले को और अधिक संदेहास्पद बनाता है तहसीलदार का वह बयान, जो उन्होंने एक प्रतिष्ठित समाचार पत्र के रिपोर्टर को दिया, जिसमें उन्होंने धान शॉर्टेज की पुष्टि की। यह बयान सार्वजनिक रिकॉर्ड का हिस्सा बन चुका है। लेकिन इसके कुछ ही दिनों बाद, जब जिला खाद अधिकारी सहित संयुक्त जांच टीम द्वारा समिति में भौतिक सत्यापन किया गया, तब उसी तहसीलदार की उपस्थिति में स्टॉक को “सही” बताया गया। यह स्थिति प्रशासनिक दृष्टि से अत्यंत गंभीर है, क्योंकि एक ही अधिकारी द्वारा एक ही मामले में दो परस्पर विरोधी निष्कर्ष प्रस्तुत किए गए। यदि धान वास्तव में कम था, तो भौतिक सत्यापन के समय वह कैसे पूर्ण पाया गया—यह प्रश्न अब तक अनुत्तरित है।
नियम स्पष्ट रूप से कहते हैं कि एक बार शॉर्टेज पाए जाने के बाद किसी भी प्रकार का स्टॉक समायोजन, भरपाई या अतिरिक्त धान जोड़ना अवैध है। ऐसे में यह आशंका भी जताई जा रही है कि प्रारंभिक जांच और भौतिक सत्यापन के बीच के समय का उपयोग स्टॉक “मैनेज” करने के लिए किया गया। यदि ऐसा हुआ, तो यह केवल समिति की नहीं, बल्कि जांच प्रक्रिया की निष्पक्षता पर भी गंभीर प्रश्न खड़े करता है। विशेषज्ञों का मानना है कि तहसीलदार द्वारा पहले शॉर्टेज दर्ज करना और बाद में उसी प्रकरण में स्टॉक को सही बताना, प्रथम दृष्टया निर्णयों में असंगति और कर्तव्य पालन में गंभीर लापरवाही को दर्शाता है।
अब यह पूरा मामला सीधे जिला अधिकारी की भूमिका से जुड़ गया है। प्रशासनिक व्यवस्था में कलेक्टर जिले के सर्वोच्च अधिकारी होते हैं और ऐसे मामलों में अंतिम जवाबदेही उन्हीं की होती है। इसके बावजूद अब तक न तो तहसीलदार की भूमिका की स्वतंत्र जांच के आदेश सामने आए हैं और न ही कोई ठोस प्रशासनिक कार्रवाई हुई है। किसानों और सामाजिक संगठनों में यह सवाल तेजी से उठ रहा है कि इतने स्पष्ट विरोधाभास, लिखित जांच प्रविष्टियों और सार्वजनिक बयानों के बावजूद जिला प्रशासन की चुप्पी आखिर क्यों बनी हुई है। क्या यह मामला कलेक्टर के संज्ञान में नहीं है, या फिर जानबूझकर निर्णय को टाल दिया जा रहा है?
प्रशासनिक जानकारों का कहना है कि यदि ऐसे मामलों में जिला स्तर पर तुरंत जवाबदेही तय नहीं की जाती, तो यह सहकारी समितियों में अनियमितताओं को मौन संरक्षण देने जैसा होगा। इससे न केवल शासन को आर्थिक नुकसान होगा, बल्कि ईमानदार किसानों और कर्मचारियों का भरोसा भी टूटेगा। रामानुजनगर में यह धारणा गहराती जा रही है कि यदि इस प्रकरण में तहसीलदार के विरोधाभासी कृत्यों पर सख्त कार्रवाई नहीं की गई, तो यह एक खतरनाक मिसाल बन जाएगी।
अब मांग की जा रही है कि जिला कलेक्टर इस पूरे मामले में तत्काल हस्तक्षेप करें, तहसीलदार की भूमिका की निष्पक्ष और स्वतंत्र जांच के आदेश दें तथा जांच प्रभावित करने या नियमों के उल्लंघन की पुष्टि होने पर निलंबन सहित बड़ी प्रशासनिक कार्रवाई करें। क्योंकि यह मामला केवल धान शॉर्टेज का नहीं रह गया है, बल्कि यह तय करने का बन गया है कि जिले में कानून और नियम वास्तव में लागू होते हैं या फिर उन्हें सुविधा और पद के अनुसार मोड़ा जाता है।





